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जयपुर- नख-शिख

ऐतिहासिक जयपुर का वर्णन

कहानी कुछ इस तरह शुरू होती हैं…

महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय (Maharaja Jai Singh II)
हिंदुस्तान के एक नायाब सूबे राजपूताना की सरजमीं पर राजपूत कछवाहा राजा सवाई जयसिंह द्वितीय एक ऐसे अद्वितीय महाराजा थे, जिन्होंने इतिहास को अपने ढंग से गढ़ने का मसूंबा बनाया और सोच के सोने की छीनी ने गढ़ दिया धरती का स्वर्ग – जयपुर। उन्होंने अपनी प्रजा के लिए युद्धों से ज्यादा सुविधाओं पर जोर दिया और दिलों पर शासन किया। उन्हीं का एक जीता जागता सपना है जयपुर, जिसे आज भारत का पेरिस भी कहा जाता है।

सुरक्षा पहली प्राथमिकता

हमारे ग्रथों में ’राजा’ उसे कहा जाता है जो अपनी प्रजा का पालन करता है और हर नागरिक की जिम्मेदारी उठाता है। महाराज जयसिंह अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह जानते थे और अपनी प्रजा की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। उन्होंने मराठों के साथ कई युद्ध लड़े और अंतत: उन्होंने एक पूरी तरह सुरक्षित राज्य का सपना देखा। सुरक्षा के बाद दूसरा सवाल राज्य के वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास का था। आखिर महाराजा ने एक सुरक्षित, आधुनिक और समृद्ध राज्य की नींव रख दी।

विद्याधर भट्टाचार्य,

महाराजा सवाई जयसिंह ने एक आधुनिक, समृद्ध और सुरक्षित शहर का सपना देखा था। लेकिन इस सपने को पूरा करने में जिन लोगों ने अहम योगदान दिया उनमें सर्वप्रथम विद्याधर भट्टाचार्य का जिक्र करना जरूरी हो जाता है। विद्याधर एक बंगाली ब्राह्मण थे, वे महाराजा के दरबार में कोषकार्य लिपिक थे और वास्तु तथा ज्योतिष के पर्याप्त जानकार थे। महाराजा ने जब एक नए नगर की कल्पना को विद्याधर से साझा किया तो उन्होंने तुरंत उनकी कल्पना के शहर का खाका तैयार कर लिया। शिल्प और वास्तु शास्त्र पर आधारित इन नए शहर की गलियां और चौराहे चौपड़ खेल की भांति समकोणीय थे। शहर के खाके ने इसके प्रति महाराजा और लोगों के प्रेम और आतुरता को और बढ़ा दिया।

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1727– सपना हुआ साकार

यूं तो नए शहर की कल्पना वर्षों से महाराजा की आंखों में थी लेकिन सभी आवश्यक चर्चाओं और शिल्प तथा वास्तु शास्त्र के आधार पर बना खाका हाथ में आने के बाद शुभ दिन देखकर सन 1727 को एक अनूठे शहर का निर्माण आरंभ हो गया। आमेर रियासत के दक्षिण में लगभग 10 किमी दूर बन रहे इस अनूठे, खूबसूरत और देश में पहली बार योजनाबद्ध तरीके से बन रहे शहर का नाम था – जयपुर। वास्तु, अंकज्ञान और ज्योतिष की पूरी तरह पालना की गई और शहर में कई स्मारक इन्हीं को ध्यान मे रखकर रचे गए। ताकि अनंत वर्षों तक जयपुर सुंदर, समृद्ध और सुरक्षित रहे। निर्माण के आरंभ के 4 वर्ष शहर की सड़कों, चौराहों, राजमहल और प्रमुख स्मारकों का निर्माण किया गया। नौ ग्रहों की तर्ज पर शहर को नौ खंडों में बांटा गया था, जिनमें से दो खंड में राजप्रासाद और शेष सात खंड प्रजा के निवास के लिए बनाए गए थे। चूंकि शहर की सुरक्षा प्रथम प्रावधान में था इसलिए इस खूबसूरत शहर को चारों ओर से मजबूत प्राचीरों और मजबूत दरवाजों से कवर किया गया। इस शहर की प्रमुख इमारतों को निर्माण पीले बलुआ पत्थरों से किया गया था।

क्यों कहते हैं गुलाबी नगरी ?

महाराजा सवाई जयसिंह का सपना आखिरकार सच हो गया था। कुछ ही वर्षों के लगातार निर्माण कार्य के बाद एक बेहद खूबसूरत शहर अस्तित्व में आया। दुनियाभर में इस अजूबा शहर की सुंदरता के चर्चे होने लगे। सुंदर चीजों को नजर भी जल्दी लगती है। सुंदर शहर दुश्मनों को भी आकर्षित करता है। इसीलिए जयपुर की सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए महाराजा ने ताकतवर मुगलों और अंग्रेजों से अच्छे दोस्ताना संबंध रखे। 1853 में जयपुर की सुंदरता के चर्चे सुनकर वेल्स के युवराज एडवर्ड ने जयपुर भ्रमण का मानस बनाया। उस समय जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह थे। “अतिथि देवो भव:” कछवाहा वंश की पुरानी परंपरा थी। विशेष अतिथि के स्वागत के लिए महाराजा रामसिंह ने सारे शहर को गुलाबी रंग में रंगने का आदेश जारी किया। एडवर्ड जब जयपुर पहुंचे तो गुलाबी रंग में रंगे खूबसूरत शहर को देखकर उन्होंने गदगद मन से कहा -’पिंकसिटी इज वैरी ब्यूटीफुल।’ तभी से जयपुर का एक नया नामकरण भी हो गया – पिंकसिटी

जयपुर- परिवहन

जयपुर देश और दुनिया से विभिन्न परिवहन साधनों से जुड़ा हुआ है। यहां सांगानेर एयरपोर्ट है जो जयपुर को भारत के बड़े शहरों और दुनिया के विभिन्न शहरों से जोड़ता है। जयपुर जंक्शन भारतीय रेल्वे का अहम जंक्शन है। उत्तर – पश्चिम रेल्वे का हैडक्वाटर जयपुर में ही है। यह शहर रेल्वे ट्रैक के माध्यम से भारत के सभी सिरों से जुड़ा है। इसी के साथ सड़क परिवहन की नजर से भी जयपुर एक समृद्ध शहर है।

वायु परिवहन

जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, सांगानेर से प्रतिदिन बहुत सी उड़ानें इसे भारत के विभिन्न शहरों से जोड़ती हैं और देश के सभी प्रमुख हिस्सों से यहां फ्लाइट्स आती भी हैं। जयपुर से अहमदाबाद, बैंगलुरू, चेन्नई, दिल्ली, गोवा, हैदराबाद, जम्मू, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़, गुवाहाटी और कोलकाता शहर वायु परिवहन से जुड़े हैं।

वहीं अंतर्राष्ट्रीय वायु परिवहन के तहत जयपुर दुबई, मस्कट और शारजाह से जुड़ा है।


रेल परिवहन

जयपुर जंक्शन राज्य का सबसे बड़ा जंक्शन है। जयपुर में उत्तर पश्चिम रेल्वे का हैडक्वाटर भी है। रेल परिवहन के तहत जयपुर मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, इंदौर, रतलाम, चंडीगढ, हैदराबाद, बैंगलुरू, गांधीनगर, पुणे, उज्जैन, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, नागपुर, इटारसी, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, पटना और त्रिवेंदम से जुड़ा है।

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सड़क परिवहन

सिंधी कैंप बस स्टैंड राज्य का सबसे बड़ा बस अड्डा है। यह जयपुर को आरएसआरएसटी के माध्यम से देश के विभिन्न शहरों से जोड़ता है, इनमें नई दिल्ली, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, पंजाब आदि राज्यों के प्रमुख शहर शामिल हैं। जयपुर से गुजरने वाला नेशनल हाइवे – 8 दिल्ली और मुंबई को जोड़ता है, नेशनल हाइवे 12 और नेशनल हाइवे 11 भी जयपुर को देश और राज्य के प्रमुख शहरों से जोड़ते हैं।

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गोल्डन ट्राएंगल

गोल्डन ट्राएंगल देश के तीन बड़े ट्यूरिस्ट डेस्टीनेशंस को जोड़ता है। यह दिल्ली जयपुर और आगरा का तिकोण है और तीनों स्थान पर्यटन का स्वर्ग कहलाते हैं, इसी कारण तीनों को मिलाने वाले तिकोण को गोल्डन ट्राएंगल कहा जाता है।

मैप पर यदि दिल्ली जयपुर और आगरा को मिलाया जाए तो एक ट्राएंगल नजर आएगा। देश के इन महत्वपूर्ण तीनों शहरों की आपसी दूरी भी लगभग समान है। गोल्डन ट्राएंगल की कुल लम्बाई लगभग 1000 किमी है और प्रत्येक दो डेस्टीनेशन की दूरी 4 से 6 घंटे की है। पर्यटक अपनी यात्रा दिल्ली के महत्वपूर्ण स्थलों को देखकर करते हैं उसके बाद आगरा का ताज और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों का विजिट करते हुए जयपुर का स्थापत्य देखकर यहां से दिल्ली रवाना हो जाते हैं। भारत का ट्यूरिज्म डिपार्टमेंट गोल्डन ट्राएंगल को पर्यटन की दृष्टि से मजबूत करने के प्रयास कर रहा है। विभाग ने पर्यटकों के लिए बेस्ट पैकेजेज का भी एलान किया है।


पधारो म्हारे देस

राजस्थान की राजधानी पिंकसिटी, आपका स्वागत करती है

जयपुर के लोग

किसी भी शहर के लोग उस शहर की संस्कृति का आईना होते हैं। जयपुर के आम शहरी की आंखों में अपने शहर के प्रति प्यार तो दिखता ही है, यहां आने वाले मेहमानों के प्रति भी उसका नजरिया बेहद उत्साहजनक होता है। यहां के लोग मेहमानों को ’सिर आंखों पर बिठाने’ की होड़ करते हैं। यहां की ढूढाणी जबान बहुत मीठी होती है और वही मृदुलता यहां के लोगों में भी झलकती है। यहां के लोग जिस तरह अपनी कला, संस्कृति और परंपराओं से प्रेम करते हैं उसकी मिसाल कहीं और देखने को नहीं मिलती। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के समय से ही यहां की हवाओं में ’अतिथि देवो भव:’ की भावना महक की तरह महसूस की जा सकती है। मेहमानों की आत्मीय मेहमाननवाजी दुनिया के कोने-कोने से आए मेहमानों को यहां बार बार खींच कर लाती है।

पधारो म्हारे देसयह राजस्थान की लोक संस्कृति की पहचान कराते एक लोकगीत की पंक्ति है। जो वास्तव में जयपुर की अनूठी हॉस्पिटिलिटी को उजागर करती है। जयपुर के लोकसंस्कारों में ही अपने महमानों से अनुरोध और अनुग्रह एक मनुहार की शक्ल में पेश आता है जिसमें वे अपने मेहमानों से यहां आने का विनम्र निवेदन करते हैं। यह ’कॉट’ जयपुर के दर्जनों होटलों की भी विशेष थीम होती है। जिसमें मेहमानों से बार बार यहां आने और आतिथ्य स्वीकार करने का अनुग्रह होता है।

“जान जाए पर वचन न जाए”  राजस्थान के लोग अपनी बात के धनी होते हैं। वचन की रक्षा के लिए यहां जान की भी कोई कीमत नहीं समझी जाती। कई लोक-कथाओं लोक-गीतों में इस उक्ति को सार्थक करने वाले संवाद रोचकता से पेश किए जाते हैं। आज भी जयपुर की लोक-संस्कृति में ऐसे तत्व विद्यमान हैं जिनमें यहां की कल्चर और ’लोहे की लकीर’ के संस्कारों को अनुप्राणित किया जा सकता है।

[tab:Cuisines of Jaipur]

जयपुर का खान-पान

बुजुर्ग कहते हैं-’जैसा खाए अन्न-वैसा रहे मन, जैसा पीये पानी-वैसी बोले बाणी।’ इस उक्ति का गहरा तात्पर्य है। जो सीधे हमारे खान-पास से जुड़ा है। जयपुर की समृद्ध कल्चर, मनुहार और मीठी बोली के पीछे कहीं न कहीं यहां के स्पेशल खानपान का असर ही है। राजस्थान विभिन्न रंगों भरा राज्य है और जयपुर संपूर्ण राजस्थान का सार। यहां के खानपान में भी विविधता है, कई रंग और स्वाद हैं। जयपुर के लोग रसना के कच्चे कहे जात हैं। अर्थात यहां बहुत प्रकार के व्यंजन लोगों के मुंह में पानी ले आते हैं। तथापि दाल, बाटी, गट्टे की सब्जी और चूरमा यहां का लोकभोज्य है। यहां के लोग मीठा और तीखा दोनो खाना पसंद करते हैं। ठेठ राजस्थानी भोजन शुद्ध देशी घी में तैयार किया जाता है। जयपुर की कढ़ी भी अपने आप में अहम स्थान रखती है।

दाल, बाटी चूरमा विशेष अवसरों पर बनाया जाता है, यहां की मिक्स दाल में घी का तड़का लगाया जाता है, बाटियों में जगरा बाटी और तलने वाली बाटी प्रमुख हैं, बाटियों को भी घी की कटोरी के साथ परोसा जाता है। यहां कई तरह का चूरमा बनाया जाता है। रोट, शक्कर और देशी घी से बनने वाला चूरमा यहां कई फ्लेवर्स में तैयार किया जाता है।

स्थानीय लोग दाल बाटी चूरमे का रीयल स्वाद महसूस करने के लिए चम्मच को एक ओर रख देते हैं और खाने में हाथ का ही प्रयोग करते हैं।

यहां के अन्य पारंपरिक भोज्यपदार्थों में लस्सी, बूंदी का रायता, लापसी, मक्का की राबड़ी, बेसन गट्टे, कैर सांगरी की सब्जी और मिस्सी रोटी प्रमुख है। यह जयपुर की स्पेशल थाली में शामिल होते ही हैं। लापसी और राबड़ी राजस्थान का ब्रेकफास्ट कहा जा सकता है। राजस्थान की ट्रेडिशनल मिठाईयों में चूरमा, गुंझिया, सीरा, इमरती, घेवर, फीणी, बालूशाही और कलाकंद शामिल हैं।

ये सभी पदार्थ किसी समय सिर्फ राजप्रासाद की रसोई तक सीमित थे, लेकिन धीरे धीरे इन व्यंजनों का जायका महल से निकलकर शहर की गली गली में पहुंच गया।

[tab:Jaipur Attire]

जयपुर का पहनावा

जयपुर के पहनावे से यहां की संस्कृति और परंपराओं के दर्शन होते हैं। राजा जयसिंह द्वितीय ( Jai Singh II)ने अन्य राज्यों से अपनी रियासत के सांस्कृतिक संकेत भिन्न करने के लिए यहां के पहनावे को लेकर विशेष फैसला किया था। यहां के पहनावे से राजपूती संस्कृति झलकती है। पुरुषों और महिलाओं के पहनावे को लेकर एक आम विश्वास यह था कि परिधान से राजपूताना की शान और नजाकत दोनो नजर आनी चाहिए थी। उसमें रंग-बिरंगे राजस्थान का डिजायनर लुक अपने आप आ गया था। पुरुषों के पहनावे में पगड़ी, धोती, पजामा और पटखा विशेष रूप से पहने जाते हैं।

पुरूष परिधान

पुरुषों के पहनावे में पगड़ी, धोती, पजामा और पटखा विशेष रूप से पहने जाते हैं।

पगड़ी

हर राजस्थानी के लिए उसकी पगड़ी इज्जत का प्रतीक होती है। यह सिर पर बांध कर पहना जाने वाला टोप नुमा वस्त्र है। यह एक लम्बी धोती जैसा रंगीन वस्त्र होता है जिसे सिर पर बांध कर पहना जाता है। उम्रदराज लोग सफेद पगड़ी पहनते थे जबकि आयु और मान के अनुसार हर किसी का पगड़ी पहनने का अंदाज अलग होता था। ऊंचे ओहदे पर बैठे व्यक्ति की पड़गी रंगीन और बड़ी होती थी। ग्रामीण इलाकों में या फिर शादियों में आज भी पगड़ी देखने को मिल जाती है।

अंगरखा

अंगरखा कवच की तरह छाती और पीठ को कवर करने वाला वस्त्र है, जैसा कि नाम से जाहिर होता है-अंग रखा। अर्थात अंगों की रक्षा करने वाला। अंगरखा एक लम्बे चोगे जैसा वस्त्र होता था जो ऊन अथवा सूत से बनाया जाता था। घुटनों तक के इस चोगे को हैसियत के अनुसार डिजाईन और रंग-रूप दिया जाता था। सिटी पैलेस म्यूजियम में महाराजा माधोसिंह के विशाल आकार के अंगरखे सभी को प्रभावित करते हैं। राजा-महाराजाओं और अमीर लोगों में अंगरखा पहनने का प्रचलन था।

धोती

धोती एक बिना सिला वस्त्र होता है जो शॉल जैसा लेकिन लम्बाई में 4 से 5 मीटर तक होता है। यह कमर पर बांधकर पतलून की तरह पहना जाता है। आज भी बुजुर्ग लोग धोती पहनते हैं। धोती बांधना भी एक कला है। इसके लिए अभ्यास की जरूरत हो सकती है। पुष्कर मेले जैसे उत्सवों में विदेशी पर्यटकों के लिए धोती बांधने जैसी प्रतियोगिताएं रखी जाती हैं। धोती का मुख्यत: रंग सफेद ही होता है लेकिन विशेष अवसरों पर रंगीन बार्डर की धोतियां पहनने का भी प्रचलन रहा है।

पटखा

पटखा एक तौलिये के आकार का वस्त्र होता है जिसे कमर पर बांधा जाता था। यह उच्च कुल के लोग कमर पर बांधते थे। युद्ध आदि में पटखे से हथियार और अन्य जरूरी सामान भी बांधा जाता था।

इस पहनावे के साथ साथ राजस्थान में पुरुष बड़ी मूछों को बडप्पन और पौरुष का प्रतीक मानते थे। मूछे रखना शान का प्रतीक होती थी। राजस्थानी वेषभूषा से पूरिपूर्ण व्यक्ति बिना मूछों के अधूरा माना जाता है। पुरुषों में आभूषण पहनने का भी रिवाज रहा है। गले में कंठमाल, कानों में कुंडल, हाथ में कड़े पहनना यहां की परंपरा रही है।

आभुषण

पुरुषों के बीच सोने की चेन या एक मोती का हार के साथ रखा झुमके. हार के साथ साथ, राजस्थान पुरुषों गौण उनके हाथ पर भारी धातु कंगन के साथ है. कंगन के रूप में जाना जाता है और पुरुषों के सामान की श्रेणी के तहत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

महिलाओं के परिधान

राजस्थानी महिलाओं के लिए भी वस्त्र और आभूषण भी यहां की संस्कृति को दर्शाते हैं।

लहंगा

लहंगे में घाघरा, चोली और ओढ़नी शामिल होते हैं। लहंगा व्रत, त्योंहार और शादी विवाह जैसे कार्यक्रमों में महिलाएं पहनती हैं। घाघरा कमर पर बांधा जाता है जो टखनों तक पैरों को कवर करता है। यह एक लम्बी रंगीन जरी के काम से सजी स्कर्ट जैसा होता है। चोली परिधान महिलाओं के वक्षस्थल को कवर करता है , यह ब्लाउज जैसा वस्त्र होता है लेकिन आकार में थोड़ा बड़ा होता है और सजावटी भी। सिर को ढकने के लिए गोटा और जरी के काम से सजी चुनरी भी होती है।

आभुषण

राजस्थानी महिलाओं को आभूषण पहनने का भी शौक रहा है। आर्थिक रूप से सम्पन्न महिलाओं में जहां सोने हीरे और मोती से बने आभूषण पहनने का शौक रहा है वहीं गरीब वर्ग की महिलाएं चांदी और पीतल से बने आभूषण पहनती थी। आभूषणों में चित्रकारी और स्टोन तथा सस्ते रत्नों का प्रयोग भी सामान्य महिलाएं करती रही हैं।

राजस्थानी लोग आज भी अपने मूल पहनावे से प्यार करते हैं और विशेष अवसरों पर इन परिधानों को पहन कर प्रसन्न दिखाई पड़ते हैं। गांवों में आज भी प्रतिदिन ये वस्त्र पहने जाते हैं। राजस्थान का असली प्रतीक यही परिधान और आभूषण हैं।

मोजड़ी

राजस्थान में पैरों में मोजडियां या जूतियां पहनने का शौक पुरुषों और महिलाओं में बराबर रहा है। गांवों में महिलाएं और पुरुष आज भी मोजडियां ही पहनते हैं। शहरो में भी अब विशेष अवसरों पर इन जरीयुक्त रंगीन मोजडियों का प्रचलन हो गया है।


वर्तमान में बहुत से युवा जींस के साथ मोजड़ी पहने नजर आ जाएंगे। जूतियों के बिना राजस्थानी परिधान अपूर्ण हैं।

[tab:Folk dances]

लोकनृत्य

राजस्थान के परिधान और आभूषणों के बाद बारी आती है यहां के लोकनृत्यों की। परिधान यहां की शारीरिक संस्कृति है तो लोकनृत्य यहां के मानसिक संस्कार। राजस्थानी उत्सवों की कल्पना बिना नृत्य के नहीं की जा सकती। नृत्य राजस्थान की आत्मा का चित्रांकन करते हैं। आनंद और शौर्य यहां की माटी में ही व्याप्त है। राजस्थान एक विभिन्न विशेषताओं वाला बहुरंगी राज्य है, इसलिए यहां के नृत्यों में भ विविधता नजर आती है। राजस्थान के प्रमुख नृत्य इस प्रकार हैं :

गवरी नृत्य

देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यह नृत्य गोला बनाकर समूह में किया जाता है। ग्रामीण परिवेश होने से इस नृत्य की सुंदरता और बढ़ जाती है। यह एक डांस-ड्रामा प्रथा है, जो सदियों से राजस्थान के अंचलों में किया जाता रहा है। यह नृत्य हाथ में थाली लेकर किया जाता है।

घूमर नृत्य

घूमर एक लोकप्रचलित और चर्चित नृत्य शैली है। विशेष अवसरों पर राजस्थान की महिलाएं घूमर नृत्य करती हैं। घूमर समूह में किया जाता है और घूमना इसमें एक सधी हुई कला के रूप में नजर आता है।

तेरहताली नृत्य

इस नृत्य की विशेषता यह होती है कि इसमें शामिल नर्तकों के हाथ, कलाई, कोहनी, कमर और पैरों में मंजीरे बंधे होते हैं और नृत्य की गति और लय के साथ बजते  मंजीरे अद्भुत संगीत पैदा करते हैं, और साथ ही आनंद भी।

कठपुतली नृत्य

राजस्थान में कहानी कहने और उसे संगीत से पेश करने की एक कला है कठपुतली। इसमें पुतलियों के माध्यम से रोचक संगीत और नृत्य किए जाते हैं जो राजस्थान के गांव गांव में प्रसिद्ध हैं। कठपुतलियों के माध्यम से राजस्थान की लोक कथाओं को प्रदर्शित किया जाता था। यह मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करते थे।

कालबेलिया नृत्य

कालबेलिया राजस्थान के सपेरा समाज का लोकनृत्य है। इसे महिलाएं काले रंग के वस्त्र पहन कर पेश करती हैं। इस नृत्य में नर्तक महिला कई तरह के स्टंट करके सभी को अचंभित  कर देती है। राजस्थानी लोकनर्तकी गुलाबो ने इस स्टाइल के डांस फोम में देश विदेश में राजस्थान का नाम ऊंचा किया है। इस डांस में पुरुष इकतारा या तंदूरा लेकर महिला नर्तकी का साथ देते हैं।

[tab:Art and Craft]

जयपुर- कला और शिल्प

जयपुर अपने आप में एक महान कलात्मक नगरी है। शिल्प और कला यहां की हवा में हैं। यहां की संस्कृति ही कलात्मकता का आदर और समन्वय करती नजर आती है। जयपुर संपूर्ण रूप में एक कलात्मक म्यूजियम है, जिसका शिल्प  विधान अतुलनीय है। फिर भी जयपुर की कुछ कलाएं अपनी खूबियों के कारण विशेष महत्व रखती है

जयपुर ज्वैलरी

जयपुर के आभूषण दुनिया भर में इसकी समृद्ध पैटर्न और भारी गहनों की वजह से प्रसिद्ध है. जयपुर में आभूषण का  र्निमाण कारीगरों द्वारा किया जाता है, जो पूरी तरह से आभूषण में अपनी प्रतिभा डालते हैं. आभूषण में फूल, ख़मीर, सूरज और चाँद के पैटर्न जो आम तौर पर राजा जय सिंह द्वितीय सत्तारूढ़ समय की झलक का वर्णन शामिल हैं।

बंधेज की साड़ी

बंधेज एक खास तरह का पैटर्न है जिससे साडियां तैयार की जाती है। यह जयपुर की खास विशेषता है। इसमें कपड़े को विभिन्न डिजाइन देने के लिए कई स्थानों पर से डोरों से बांध दिया जाता है और रंग में डाला जाता है। रंगने के बाद इसे सुखाया जाता है और इससे वांछित जगहें कलर होने से बच जाती हैं और वे खूबसूरत डिजाइनों के रूप में उभर कर आती है। यही कार्य कई जगह पर विभिन्न डोरों, जरी के तारों का इस्तेमाल करके भी किया जाता है। यह साडि़यों के पल्लों और विभिन्न हिस्सों में खूबसूरत चित्रकारी करने की तरह है।

कठपुतलियां

कठपुतलियां भी जयपुर का मौलिक क्राफ्ट है। सदियों से यहां कठपुतलियों का निर्माण होता रहा है। कठपुतलियों को डोरों की सहायता से नचाना एक कला है। जयपुर में हवामहल के आसपास कठपुतलियों का निर्माण बड़े पैमाने पर होता है।

सांगानेर ब्लॉक प्रिंट

सांगानेर में ब्लॉक प्रिंटिंग भी सैकड़ों वर्षों से की जाती रही है। इसमें कपड़े पर लकड़ी के कलात्मक डाईयों से डिजाईन उकेरे जाते हैं। इस कार्य में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है और ये ईको फ्रेंडली भी होते हैं। इससे फायदा यह होता है कि ये कपड़े देखने में तो खूबसूरत होते ही हैं, साथ ही त्वचा के लिए भी अच्छे साबित होते हैं। जयपुर से बड़ी मात्रा में सांगानेरी प्रिंट का कपड़ा निर्यात किया जाता है।

मिनिएचर चित्रकला

मिनिएचर पेंटिंग भी राजस्थान की संस्कृति का हिस्सा है। राजस्थान में बारीक चित्रकारी को मिनिएचर पेंटिंग कहते हैं। यह इतनी बारीक होती है कि सिर्फ एक बाल से इस चित्रकारी को अंजाम देना होता है। मिनिएचर पेंटिंग्स में राजसी ठाठ बाट को दर्शाया जाता रहा है। जयपुर की मिनिएचर पेंटिंग विश्व विख्यात है।

मूर्तिकला

जयपुर की मूर्तिकला भी विश्व में बेजोड़ है। यहां चांदपोल इलाके में गली गली में पत्थर की मूर्तियां बनाई जाती हैं। जयपुर के अर्जुन प्रजापति को मूर्तिकला में पद्मश्री से सम्मानित भी किया जा चुका है। जयपुर में संगमरमर की मूर्तियों के साथ साथ विभिन्न कलात्मक मूर्तियां, छतरियां और स्थापत्य शिल्प भी तैयार किए जाते हैं।

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जयपुर के प्रमुख त्योंहार

तीज-गणगौर : महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने उत्सवों को शहर की उन्नति का प्रमुख आधार माना। यहां की रानियों और शहर की महिलाओं ने त्योंहारों को आम शहरों से खास बनाया। जयपुर में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योंहारों में तीज और गणगौर हैं जो यहां की स्त्रियों की पारंपरिक समृद्धि का प्रतीक हैं। यहां के त्योंहार और उत्सव महिलाओं की मौजूदगी और प्रसन्नता से अलग हो ही नहीं सकते। यही कारण है 1799 में महाराजा प्रतापसिंह ने जनाना महल की दीवार को हवामहल बना दिया, ताकि महल की महिलाएं खिडकियों से शहर के उत्सवों का आनंद ले सकें। तीज के दिन महिलाएं श्रंगार करती हैं, खेलती हैं तीज माता को पूजती हैं, तीज माता की सवारी देखती हैं और मेले का लुत्फ उठाती हैं। इस दिन शिव – पार्वती की पूजा की जाती है। ऐसा ही एक त्योंहार गणगौर भी जयपुर में धूमधाम से मनाया जाता है।

हाथी उत्सव : जयपुर के राजमहल और सेना के शान थे हाथी। जब राजतंत्र का अंत हुआ तो हाथियों के मालिकों के पास रोजगार नहीं रहा। बाद में पर्यटन विभाग ने हाथियों के मालिकों को रोजगार मुहैया कराने के लिए हाथी सवारी की शुरूआत की। पर्यटन को ही बढ़ावा देने के लिए चौगान में हाथी उत्सव भी आयोजित होने लगा। वर्तमान में यह विदेशी मेहमानों के बीच काफी लोकप्रिय उत्सव है। इसमें सजे धजे हाथियों को कांपिटीशन होता है, कई रोचक खेल होते हैं , हाथी करतब दिखाते हैं और सबसे सुंदर हाथियों को पुरस्कार से नवाजा जाता है।

मकर संक्रांति : पतंगोत्सव जयपुर की पहचान है। जनवरी में सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो जयपुरवासी पतंग उड़ाकर सूर्य का स्वागत करते हैं। जयपुर के आसमान में लाखों पतंग नजर आती हैं और पेंच काटे जाते है। जयपुरवासियों का उत्साह संकरात के अवसर पर ही देखने को मिलता है। यह कौमी एकता को बल देने वाला अनूठा उत्सव है। क्योंकि हर जाति धर्म से जुड़े लोग इस उत्सव में पूरे उत्साह और खुशी के साथ शरीक होते हैं।

जयपुर के कुछ तथ्य

भौगोलिक तथ्य


जयपुर का मौसम

ग्रीष्म में तापमान

शीत में तापमान


जनसंख्यात्मक तथ्य


भू-विज्ञान तथ्य


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