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तीर्थराज गलता

Galtajiजयपुर शहर के पूर्व में अरावली की सुरम्य पहाडि़यों के बीच हिन्दू आस्था का प्रमुख केंद्र है गलताजी। जयपुर आगरा राजमार्ग पर सिसोदिया रानी के बाग से खानियां बालाजी होते हुए गलता धाम पहुंचा जा सकता है। इस रास्ते से जाने पर यह तीर्थ शहर से लगभग 15 किमी है। तीर्थ का मुख्य द्वार गलता गेट राष्ट्रीय राजमार्ग सं-8 पर स्थित है। यहां से गलता पहुंचने के लिए पहाड़ी पर पैदल मार्ग लगभग 1 किमी है।

गलता गेट से चलने पर पहाड़ी रास्ते के बीच-बीच अनेक मंदिर हैं। गलता गेट से ही ये मंदिर रास्ते में आना शुरू हो जाते हैं। इनमें दक्षिणमुखी हनुमानजी, संतोषीमाता मंदिर, रामरामेश्वर मंदिर, कल्याणजी मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, सिद्धि विनायक मंदिर, वीर हनुमान मंदिर और पापड़ा हनुमान मंदिर इनमें प्रमुख हैं। पहाड़ी की शिखा से एक रास्ता सूर्य मंदिर भी पहुंचता है जहां से जयपुर शहर का शानदार नजारा दिखाई देता है। यहां से पहाड़ी के पीछे ढलान में पैदल मार्ग ऋषि गालव मंदिर और पवित्र कुण्डों तक पहुंचता है। शहर के चांदपोल से सूरजपोल के मुख्य मार्ग से गलतातीर्थ का सूर्य मंदिर ऐसा दिखाई पड़ता है जैसे सूर्यदेव यहीं से अपनी यात्रा प्रारंभ करते हैं।

गलता तीर्थ का इतिहास, महिमा और भव्यता अद्भुद है। कहते हैं गलता के सूर्य का पानी कभी नहीं सूखता। स्थान का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व होने के कारण 18 वीं सदी में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के दीवान राव कृपाराम ने यहां हवेलीनुमा भव्य मंदिर बनवाए। यहां सीतारामजी मंदिर, ज्ञानगोपाल मंदिर, हनुमान गढी, गंगामाता मंदिर, नाभा निवास आदि आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। हरी-भरी पहाडि़यां और प्राकृतिक सौन्दर्य इस पावन स्थल का मुख्याकर्षण है।

जयपुर शहर की पूर्वी पहाडि़यों के बीच सदियों से श्रद्धा का केंद्र बना यह ऐतिहासिक तीर्थ आज अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन के नक्शे पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

अरावली की गोद में ऐतिहासिक मंदिर

गलता तीर्थ ब्रह्मा के पौत्र और महिर्षी गलु के पुत्र ऋषि गालव की तपस्या स्थिली है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि ऋषि गालव ने यहां साठ हजार वर्षों तक तपस्या की थी। ऐसी मान्यता है कि ऋषि गालव के गुरू विश्वामित्र थे। जब गालव की शिक्षा पूर्ण हुई तो गावल को दीक्षा दी गई। दीक्षा के बाद गुरू को गुरूदक्षिणा देने का समय आया। विश्वामित्र ने गालव से यह कहकर दक्षिणा लेने से मना कर दिया कि वे ब्राह्मण पुत्रों से दक्षिणा नहीं लेते। किंतु गालव भी गुरू को दक्षिणा देने के लिए तत्पर थे। बार बार मना करने पर भी जब गालव नहीं माने तो विश्वामित्र ने उनसे दक्षिणा में 800 श्यामकर्ण घोड़े मांगे। कहा जाता कि श्यामवर्ण घोड़े का सिर्फ दाहिना कान काला होता है शेष शरीर का संपूर्ण हिस्सा सफेद होता है। कहते हैं गुरू को दक्षिणा में श्यामकर्णी घोड़े देने के लिए गालव ने इसी स्थल पर साठ हजार वर्षों तक तपस्या की और गरूड़ को प्रसन्न किया। वरदान में उन्हें माधवी और तीन राजाओं से श्यामकर्णी घोड़ों की प्राप्ति हुई।

एक और मान्यता इस तीर्थ से जुड़ी है। कहा जाता है यहां गौमुख से निरंतर बहने वाली धारा गंगा की है। इससे जुड़ी भी एक किंवदंति है। ऋषि गालव प्रतिदिन यहां से गंगा स्नान के लिए जाते थे। उनका तप और आस्था देखकर गंगा मां बहुत प्रसन्न हुई और गालव के आश्रम में स्वयं उपस्थित होकर बहने का आशीर्वाद दिया। कहते हैं तब से गंगा की धारा यहां अनवरत बहती है।

गालव की तपोस्थली और गंगा के मानस प्रवाह के कारण ही इस ऐतिहासिक स्थल को तीर्थ का दर्जा मिला है। यहां के सूर्य और गोपाल कुण्डों में स्नान कर श्रद्धालु पापों से मुक्ति की कामना करते हैं। मकर संक्रांति के दिन यहां हिन्दू आस्थावान हजारों की तादाद में आकर दान पुण्य करते हैं और पवित्र जलाशयों में स्नान करते हैं। बिहारी व बंगाली समाज के लोग छठ पूजा के अवसर पर यहां सूर्य उपासना करते हैं जिसका नजारा वातावरण में भक्ति का मनोहारी रंग भर देता है। कार्तिक के पावन मास में श्रद्धालु महिलाएं यहां के पावन कुण्डों में कार्तिक स्नान के लिए सुबह तड़के से ही कतारों में लग जाती हैं।

सात पावन कुण्ड

गलता तीर्थ में सात पावन कुण्ड हैं किंतु दो कुण्ड प्रमुख हैं जिनमें यहां आने वाले श्रद्धालु स्नान करते एवं पूजा सम्पन्न करते हैं। महिलाओं और पुरूषों के स्नान करने के लिए अलग अलग कुण्ड हैं। इनमें ऊपर वाले कुण्ड को सूर्यकुण्ड कहते हैं। हाल ही इसी कुण्ड की सफाई का कार्य किया गया है। इस कुण्ड में पुरूष श्रद्धालु स्नान करते हैं। कुण्ड में गौमुख से गालव गंगा प्रवाहित होती है। लगभग 60 फीट गहरे इस कुण्ड के सामने अहाता है और इसी अहाते में पहाड़ की ओट में गंगा माता का मंदिर है। सूर्य कुण्ड के नीचे महिलाओं के स्नान के लिए कुण्ड बना हुआ है जिसे गोपाल कुण्ड के नाम से जाना जाता है। कुण्ड के बीचोंबीच बनी कमल और शंख की आकृतियां बहुत खूबसूरत लगती हैं। कुण्ड का पानी भी गहरे हरे रंग का है जो बहुत आकर्षित करता है। इस कुण्ड की गहराई सूर्य कुण्ड जितनी नहीं है लेकिन फैलाव में यह सूर्यकुण्ड से ज्यादा बड़ा है। कुण्ड के सामने की ओर बनी छतरियों का शिल्प और चित्रकारी मन मोह लेती है। इसी कुण्ड से कुछ सीढियां उतरकर गैलरीनुमा कक्ष बने हुए हैं जहां महिलाएं स्नान के बाद परिधान बदल सकती है। सूर्यकुण्ड गलता पहाड़ी की ढलान पर बना हुआ है इसलिए गोपाल कुण्ड तथा निचले परिसर में आने के लिए पहाडी के ढलान के साथ सीढियां बनी हुई हैं। गलता तीर्थ के अन्य कुण्ड बहुत प्राचीन हैं, इनमें कदम्ब कुण्ड का ऐतिहासिक महत्व है। यह कुण्ड सूर्यकुण्ड के पीछे स्थित गालव मंदिर के पीछे स्थित है। एक छोटा कुण्ड ऋषि गालव मंदिर के ठीक सामने है। सूर्यकुण्ड के ऊपर दीवार में गाय के मुख से एक प्राकृतिक जलधारा कुण्ड में गिरती है। इसी धारा को गालव गंगा के नाम से जाना जाता है। सूर्यकुण्ड की सफाई के दौरान यह धारा रोक दी गई थी। यह ऐतिहासिक पल था। क्योंकि सदियों से यह धारा अनवरत है।

Video: तीर्थराज गलता

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p style=”text-align:justify;”>गौमुख से फिर बही गालव गंगा

गलता स्थित सूर्यकुण्ड की सफाई के चलते पिछले माह गौमुख से रोकी गई पवित्र धारा को 9 जुलाई रविवार दोपहर पूजा अर्चना और विधि विधान के साथ पुन: आरंभ किया गया। पूजा एवं गंगा आव्हान का कार्यक्रम पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। दोपहर सीतारामजी मंदिर से पीठाधीश्वर, उनके शिष्य व उपस्थित गणमान्य जन पूजा सामग्री लेकर गाजे बाजे के साथ सूर्यकुण्ड के ऊपर बनी छतरी में पहुंचे। यहां हवन एवं पूजन के कार्यक्रम हुए तथा मंत्रोच्चारण कर गंगा का आव्हान किया गया। पंडितों ने सीढी से उतर कर गौमुख का भी पूजन किया और फूलमाला पहनाई। इसके बाद गंगा मैया और गलता धाम के जयकारों के साथ गौमुख से पूर्व छोटे कुण्ड से अवरोधक हटा दिया गया। गौमुख से धार निकलकर जैसे ही सूर्य कुण्ड में गिरी गलता घाटी श्रद्धालुओं की तालियों और जयकारों से गूंज उठी। कार्यक्रम के सम्पन्न होते होते आकाश में घने बादल छा गए और घनघोर बारिश शुरू हो गई। यह देख वहां मौजूद श्रद्धालुओं ने इसे गंगा के आव्हान का सुखद परिणाम बताया। कार्यक्रम के बाद वहां उपस्थित सभी लोगों को सीतारामजी मंदिर में पंगत प्रसाद कराया गया। पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज ने बताया कि तीन माह पहले सूर्यकुण्ड में डूबकर एक युवक की मौत हो गई थी। पुलिस प्रशासन ने शव की तलाश में कुण्ड 7-8 फीट खाली करा दिया था। इसके बाद ही कुण्ड की सफाई का विचार आया। सफाई में कुण्ड से 300 ट्रॉली मलबा और कचरा निकला। इनमें 6 ट्रॉली तो खंडित मूर्तियां ही थी। पीठाधीश्वर ने कहा कि धर्म के नाम पर पवित्र स्थलों को दूषित करना पाप के समान है। उन्होंने इंटरनेट और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गलता को मंकी टेम्पल नाम से प्रचारित करने वालों को भी आडे हाथों लिया।

मंकी टेम्पल नहीं

यहां सैकडों बंदरों की उपस्थिति होने के कारण कुछ लोगों ने इसे मंकी टेम्पल के नाम से प्रचारित किया है। तीर्थ की महिमा जानने समझने वाले श्रद्धालुओं में इस बात से रोष है। तीर्थ के पीठाधीश्वर भी इस पावन और ऐतिहासिक स्थल को मंकी टेम्पल के नाम से पुकारे जाने पर आहत हैं। उनका  कहना है कि कुछ एकाध दशक पूर्व यहां एक्का दुक्का बंदर थे। उससे पूर्व कुछ संख्या में लंगूर वानरों की मौजूदगी थी। यहां बड़ी संख्या में बंदरों की मौजूदगी जयपुर प्रशासन और वन विभाग की लापरवाही थी। शहर में बंदरों के उत्पात को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने बंदरों को शहर से बाहर छोड़ने का ठेका दिया था। ठेकेदारों ने शहरभर से बंदर पकड़े और दूर वनप्रदेश में छोड़ने के बजाय यहां गलता की पहाडि़यों में छोड़ दिया। बाद में फुटकर व्यापारियों ने बंदरों के लिए खाघ सामग्री विक्रय करने का धंधा जमा लिया और यहां आने वाले श्रद्धालुओं को धर्म का हवाला देकर बंदरों के लिए गुड़ चना केले व अन्य सामग्री खरीदने पर जोर डालने लगे। अपने स्वार्थ के लिए इन फुटकर व्यापारियों ने स्थानीय लोगों में और लपका किस्म के गाईडों ने विदेशी पर्यटकों के जेहन में इस पावन तीर्थ को मंकी टेम्पल के नाम से मशहूर कर दिया है। गलता का इतिहास और वैभव अपार है। यहां की सुरम्य घाटियां और मंदिर श्रद्धा को आश्रय देते हैं। शहर से खदेड़े गए बंदर भी इस पावन स्थली में निश्शंक विचरण करते हैं। आप जब यहां आएंगे तो पाएंगे यह मंकी टेम्पल नहीं, श्रद्धा और विश्वास की पावन भूमि है।

कब और कैसे पहुंचें

यंू तो वर्षभर गलता तीर्थ श्रद्धालुओं के स्नान के लिए खुला होता है लेकिन बारिश के मौसम में यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ साथ पवित्र कुण्ड में स्नान का आनंद ही अलग है। गलता पहुंचने का एक मार्ग नेशनल हाईवे पर स्थित गलता गेट से है लेकिन यह मार्ग पदमार्ग है, चढाई और ढलान पार करने ले लिए लगभग 2 किमी पैदल चलना होता है। निजी वाहन या टैक्सी से पहुंचने के लिए ट्रांसपोर्टनगर से घाट की गूणी और सिसोदिया गार्डन हाते हुए यहां आराम से पहुंचा जा सकता है। यहां प्रवेश के लिए कोई शुल्क निर्धारित नहीं है लेकिन अगर आप यहां के खूबसूरत नजारों को अपने कैमरा में क्लिक करना चाहते हैं या वीडियो लेना चाहते हैं तो मंदिर ट्रस्ट से आज्ञा लेकर व निर्धारित शुल्क जमा कराने के बाद कैमरा ऑन कर सकते हैं। अगर आप कैमरा लेकर यहां आए हैं तो गलता पहाडि़यों की शिखा पर स्थित सूर्य मंदिर से जयपुर शहर का नजारा क्लिक करना ना भूलें।

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p style=”text-align:justify;”>आशीष मिश्रा
09928651043
पिंकसिटी डॉट कॉम
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