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जयपुर : मूर्तिकला

जयपुर : मूर्तिकला (Jaipur : Sculptural Art)

Sculptural-Art

जयपुर कलाओं का शहर है। यहां एक पत्थर भी बेजान और निर्जीव वस्तु नहीं। यहां के कलाकार पत्थर में भी जान डालने में माहिर हैं। जयपुर में चांदपोल बाजार में एक पूरा मोहल्ला मूर्तिकारों का है जहां रोजाना सैकड़ों की तादाद में मूर्तियां बनाई जाती हैं। जयपुरी मूर्तियों की मांग विदेशों तक है। यहां पत्थर पर इतनी सजीवता के साथ कला को उकेरा जाता है कि वे बोलती सी महसूस होती हैं, उनके चेहरों के भाव भी पढे जा सकते हैं। जयपुर के मूर्तिकार अर्जुन प्रजापति तो घूंघट में दिखाई देता सुंदर नारी का चेहरा गढ़ने के लिए माने जाते हैं। उन्हें मूर्तिकला में कई राष्ट्रीय पुरस्कार तक मिल चुके हैं।

युवा कलाकारों में उत्साह

जयपुर के युवाओं ने अपने पुरखों के इस कार्य को धरोहर की तरह संभाला है और अपने तरीके से आगे बढा रहे हैं। जयपुर के युवा मूर्तिकार सोनू भारद्वाज और नरेश भारद्वाज ने अपनी मूर्तिकला से सभी को प्रभावित  किया है। वे अन्य मूर्तिकारों की तरह महापुरूषों, देवी देवताओं, पशुओं और सुंदर स्त्रियों की प्रतिमओं तक सीमित नहीं रहे हैं। उन्होंने यूरोपियन लेडी को पत्थर में उकेर कर उसके चेहरे में धैर्य और शालीनता के भाव पिरो दिए हैं। जितनी रोचक और सुंदर ये मूर्तियां हैं उतना ही रोचक है मूर्तियों के निर्माण की कहानी। जयपुर में मूर्तियां प्राय: संगमरमर पत्थर से बनाई जाती हैं। यह पत्थर मकराना और किशनगढ से प्राप्त होता है। पत्थर के चुनाव से लेकर कटाई, छंटाई, कलर, कारविंग, पॉलिश के बाद ही एक खूबसूरत मूर्ति तैयार होती है। मूर्तियों में दूधिया चमक मूर्तिकार के अथक परिश्रम का नतीजा होती है।

मूर्तियों के निर्माण की प्रक्रिया

जिस काद की मूर्ति बनानी हो उसी हिसाब से संगमरमर पत्थर का चयन किया जाता है। सवा फीट ऊंची मूर्ती के लिए पंद्रह इंच लम्बा चौड़ा पत्थर चुना जाता है। पत्थर की लंबाई के साथ साथ इसकी चौड़ाई का भी ध्यान रखना होता है। हर कलाकार अपने हिसाब से मूर्तियों का निर्माण करता है। कोई मूर्ति बनाने की शुरूआत मुंह से करता है और कोई पैरों से। सबसे पहले मूर्ति का शरीर गढा जाता है और फिर उसकी मशीन से छंटाई की जाती है। चेहरे को आकृति देने के लिए महीन टांकी और हथौडे से नाक कान आंख और मुंह बनाए जाते हैं। मूर्ति तैयार होने  के बाद भट्टी लगाई जाती है। मूर्ति को हल्का तपा कर फिर इसे मशीन से तराशा और घिसा जाता है। फिर इसे चिकना करने के लिए पॉलिश की जाती है।

पारंपरिक महिला खास पसंद

मूर्तियों में राजस्थानी पारंपरिक महिला खरीददारों की खास पसंद  होती है। मूर्ति के निर्माण के लिए पत्थर का ब्लॉक लिया जाता है। इस पर ब्लैक कलर से ड्राइंग की जाती है। कोयले की  रूल से पत्थर पर एक कच्चा रेखाचित्र उकेरा जाता है। इसके बाद कारविंग या आउटलाइन बनाने का काम  होता है। चेहरे पर नक्काशी कर इस पर रंग चढाया जाता है।

पत्थर पर मीनाकरी

इन मूर्तियों को गहने और आभूषण से सजी दिखाने के लिए पत्थर पर मीनाकारी और कुंदनकारी भी की जाती है। पत्थर पर गडनशीलता के कार्य से आभूषण और वस्त्र उकेरे जाते हैं। गोल्डन वर्क और सिल्वर वर्क के लिए सुनहरे और पीले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। हाथों की चूड़ियां बनाने के लिए पत्थर को ही तराशा जाता है और बाद में चूड़ियों में अलग अलग रंग भर दिए जाते हैं।

वियतनाम से भी आता है पत्थर

सफेद संगमरमर से अक्सर सुंदर नारियों की मूर्तियां गढ़ी जाती है। इन मूर्तियों के लिए पत्थर भी खास होता है। यह सफेद पत्थर मकराना के अलावा जीरी, कोटपुतली, अहमदाबाद और वियतनाम से मंगाया जाता है। ये पत्थर अपने आप में नायाब और कीमती होते हैं। इनकी खास बात ये है कि ये हमेशा चमक देते हैं और काले नहीं पड़ते।

मूर्तियों पर रंग

मूर्तियों पर रंग करना भी एक कला है। कलाकार की कोशिश होती है कि मूर्ति पर ऐसा रंग चढाया जाता जो कभी न उतरे। रंगों में नेचुरल कलर, वाटर कलर, ऑयल कलर आदि का प्रयोग किया जाता है। रंगों को वाटरप्रूफ बनाने के लिए मूर्तियों पर रंग चढाने के बाद मशीन से एक तरल पदार्थ ’लेकर’ लगाया जाता है। इससे रंग जलरोधी हो जाते हैं।

काम से होती है कीमत

मूर्तियों की कीमत पत्थर, काम, खूबसूरती आदि से तय होती है। प्राय: फीट या इंच के अनुसार मूर्तियों की कीमत तय की जाती है। एक फीट की मार्बल लेडी की कीमत पंद्रह हजार से तीन लाख तक हो सकती है। जबकि एक फीट में बनी यूरोपियन लेडी की कीमत सात हजार तक भी होती है। एक फीट की ही पारंपरिक राजस्थानी सुंदरी की कीमत पांच से सात हजार तक भी हो सकती है।

15 दिन से 2 महीने का समय

कलाकारों को दो फीट की मूर्ति बनाने में दो महीनों का समय भी लग जाता है। कार्य की बारीकी पर भी समय निर्धारित होता है। आमतौर पर कलाकार छोटी मूर्ति पंद्रह से बीस दिन में तैयार कर लेते हैं।

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