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नाहरगढ रेस्क्यू सेंटर

नाहरगढ रेस्क्यू सेंटर (Nahargarh rescue center)

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नाहरगढ़ रेस्क्यू सेंटर एक पहाड़ी और वन क्षेत्र है। यहां जीप की सफारी कर प्रकृति के अप्रतिम नजारों का आनंद लिया जा सकता है। इस क्षेत्र में वन विकसित किए गए हैं। यह क्षेत्र 70 हेक्टेयर तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र ऊंचे परकोटा से घिरा हुआ है। किसी समय इस क्षेत्र का विकास जयपुर के महाराजा माधोसिंह द्वितीय ने पोलो मैदान के रूप में कराया था। यह क्षेत्र चारों तरफ से बुलंद प्राचीरों से घिरा हुआ था। महाराजा माधोसिंह अपने मित्रों और मेहमानों के साथ यहां शिकार का आनंद लेने आया करते थे। वर्तमान में यह इलाका एक बार फिर संरक्षित किया गया है और यहां रेस्क्यू सेंटर व बॉयलॉजिकल पार्क विकसित किया गया है। वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के अनुसार यहां वन्यजीवों को संरक्षण देने के लिए 2002 में वन्य प्राणियों को स्थापित किया गया था। इन प्राणियों को सर्कस आदि से मुक्त कराकर यहां रखा गया और उन्हें प्राकृतिक वातावरण देने के प्रयास किए गए जो अब भी जारी हैं। यह सेंटर राजस्थान सरकार के वन्यजीव विभाग के देखरेख में चल रहा है।

सरकार ने यहां न केवल वन्यजीवों की रक्षा के लिए पुख्ता प्रबंध किए हैं बल्कि इलाके को चारों ओर से तारबंदी कर सुरक्षित भी किया है। इसके अलावा  यहां चौकियों की भी स्थापना की गई है। सेंटर में बाघों और शेरों की मौजूदगी भी है। इसलिए इसका महत्व और जिम्मेदारी और बढ जाती है। बाघों और शेरों के लिए सेंटर में अर्द्ध चंद्राकर भाग को विकसित किया गया है जो पूरी तरह से इन स्पेशल वन्य जीवों के लिए अनुकूल हैं। इस क्षेत्र की अधिकतम क्षमता 50 टाइगर्स के अनुकूल है। वर्तमान में यहां 30 बाघ और 14 शेरों का संरक्षण किया गया है।

बाघ यूं तो शांत प्रकृति का पशु है लेकिन कुछ अवसरों पर वह हिंसक भी हो जाता है। बाघों को एकांत में रहना पसंद है और उन्हें अपने इलाके में किसी और की आवाजाही बर्दाश्त नहीं होती। जबकि शेर मिलनसार प्राणी है और झुंड में रहना ही पसंद करता है। इलाके में शेरों का दहाड़ना सुना जा सकता है। इलाके के आसपास रहने वाले लोग अक्सर शेरों की हुंकार और दहाड़ सुनते रहते हैं। पर्यटक अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि शहर के पास बसे इस इलाके में इतनी बड़ी संख्या में बाघों और शेरों की उपस्थिति है। हालांकि इस क्षेत्र में पर्यटन या आम लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित है।

इस  सेंटर को स्थापित करने के पीछे मूल भावना सर्कस में लोगों का मनोरंजन करने वाले प्राणियों को मुक्त कराना था। यहां आवारा जंगली जानवरों के लिए स्थान नहीं है। लेकिन, यहां घायल जंगली जानवरों का इलाज करने की सुविधा है। जानवरों का इलाज हो जाने के बाद उन्हें किसी अन्य वन्य क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है।

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