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घाट के बालाजी

घाट के बालाजी

आज के जयपुर में कुछ इमारतें ऐसी हैं, जिन्होंने जयपुर के नक्शे को बनते देखा है। गंगापोल पर हुआ भूमि पूजन और नींव में पहला पत्थर जमते देखा है। आमेर रियासत के आसपास ऐसे गांव और परगने थे जो जयपुर बसने के बहुत पहले से आबाद थे। पहाडि़यों की खोहों-कंदराओं में ऐसे स्थान रहे हैं जो ज्ञात-अज्ञात महात्मनों के साधना स्थल रहे हैं। जयपुर शहर के पूर्व में अरावली की पहाडि़यों के पार जामडोली गांव के मार्ग मे स्थित घाट के बालाजी का मंदिर उन्हीं बूढी इमारतों में से एक है, जिन्हें जयपुर के खूबसूरत महलों का पितामह कहा जा सकता है।

जयपुर की खूबसूरती को अपने कैमरे और आंखों से छानने हम एक बार फिर निकले नए सफर पर-घाट के बालाजी। जयपुर शहर से इस मंदिर की दूरी लगभग 8 किमी है। परकोटा के भीड़-भाड़ वाले रास्तों से निकलकर ट्रांसपोर्टनगर होते हुए आगरा रोड पकड़ा। संकरी और तीव्र घुमावदार घाट की गूणी पर राम कहकर ट्रैफिक आगे बढ़ता है। भला हो उन इंजिनियरों का जो इस पहाड़ी को भेदकर टनल के निर्माण में रात-दिन जुटे हैं। ढलान से उतरकर हम चमकदार राष्ट्रीय राजमार्ग-11 पर थे। यहां से कुछ आगे चलने पर सिसोदिया रानी का बाग, इसी के साथ एक सड़क घाट के बालाजी और गलता तीर्थ की ओर जाती है।

पतली सड़क, सावन का भीगा सा महिना, ऊंची-नीची सड़क के दोनो ओर माटी के टीले और उनके पाश्‍र्व में अरावली की हरी-भरी पहाडि़यां। सुरम्य वातावरण। कुछ ही मिनटों में हम एक विशाल हवेलीनुमा तीन मंजिला इमारत के सामने थे। यही घाट के बालाजी का मंदिर था।

मंदिर का मुख्यद्वार सामान्य झरोखायुक्त शैली से बना है। यह पुरानी हवेलियों मुख्यद्वार की तरह है। पहाड़ी की तलहटी पर बना होने के कारण मंदिर परिसर दो भागों में बना है। मुख्यद्वार से भीतर प्रवेश करने पर एक खुला कच्चा चौक मंदिर का पहला परिसर है। चौक परिसर की प्राचीरों के दोनो कोनों पर छतरियां भी बनी हुई हैं।

इस बड़े चौक से सीढि़यां हवेलीनुमा मंदिर के दूसरे परिसर तक पहुंचती है। सतह से तीन मंजिला इस मंदिर के मध्यभाग में सिंहद्वार हर मंजिल पर गोखोंयुक्त झरोखों से सुसज्जित है। इसीकतरह गोलाकार कोने हर मंजिल पर झरोखा बनाते हुए शीर्ष पर जाकर छतरी में बदल जाते हैं। मुख्यद्वार से कोनों की इन छतरियों को मिलाने के लिए छपा हुआ बरामदा है। बरामदे भीतर से तिबारियों और बाहर से खिड़कियों का काम करते हैं। सिंहद्वार से प्रविष्ट होकर पौलीनुमा गलियारा है जिससे हम मुख्य चौक में पहुंचे। प्राचीन नागर शैली के इस हवेलीनुमाभवन का चौक परिसर कुछ बदला हुआ सा दिखा। आमतौर पर यह चौक खुला होता है लेकिन दो छोटी मंजिलों जितने ऊंचे इस चौक को छपवाया गया है। बाद में जानकारी मिली कि चौक अपनी मूल अवस्था में खुला हुआ ही था। बाद में छाया और अन्य सुरक्षा कारणों से मंदिर की छत छपवा दी गई।

इसी चौक में सिंहद्वार के ठीक सामने तिबारीनुमा जगमोहन के अंत:पुर में विराजित हैं घाट के बालाजी। आदमकद विशाल दैदिप्याकार मूर्ति। सिंदूर का चोला और चांदी के वर्क का श्रंगार। मीनाकारीयुक्त मुकुट पर लिखा श्रीराम का नाम। मुख्यमूर्ति के बायीं ओर हनुमान की छोटी मूर्ति भी विराजित है।

मंदिर के अहाते में पहुंचकर लगता है जैसे हवामहल में आ गए हैं। भीतरी परिसर के चौक के चारों तरफ बने बरामदों में से पहाड़ी हवा गुनगुनाती आती है और क्लांत शरीर की सारी थकान हर लेती है। मुख्य मंदिर के तल वाले बरामदों को जाली से कवर किया गया है। मंदिर के मेहराब, झरोखे कंगूरे, गोखे सभी हिन्दू नागर शिल्प शैली का मनोहारी उदाहरण हैं। चौक के बायीं ओर से संकरी सीढियां दूसरे तल पर बने बरामदे में जाती हैं। ऊपर पहुंचने पर छोटा शिव मंदिर दिखाई देता है। शिवालय में मूर्ति सामान्य संगमरमर की है लेकिन शिवालय से बाहर नंदी और स्तंभ अपने शिल्प से हैरत में डालते हैंं। काली पाषाण शैलों से बने ये शिल्प अदभुद रूप दक्षिण की द्रविड़ शैली की शिल्पकला का आभास देते हैं। स्तंभों पर बारीक नक्काशी की गई है। यहीं बरामदा परिसर में पंचगणेश भी विराजित हैं। गणेश की पांच मूर्तियां एक साथ। यहां कोई शिल्प तो नहीं लेकिन गणेश की इतनी सारी सिंदूर का चोला चढ़ी पूजित मूर्तियां देखकर अचंभा होता है। मंदिर का चौक छत से छप जाने के कारण हॉल के रूप सामने है। दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से होने वाली चित्रकारी अब पुरानी पड़ गई है लेकिन सौन्दर्य बरकरार है। कहीं अंजना मां का दुलार पाते बाल हनुमान, कहीं रथ में राम लक्ष्मण के साथ जानकी का विहार, कहीं पर्वत उठाए उड़ रहे पवनपु़त्र तो कहीं राम दरबार में सेवक की भूमिका निभाते बजरंग बली। चित्रों पर कुछ पलों के लिए आंखे स्थिर रह जाती हैं। छतों पर भी उभरी हुई चित्रकारी मन मोह लेती है।

मंदिर के महन्त सुदर्शनाचार्य महाराज ने मंदिर की प्राचीनता और महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि घाट के बालाजी का यह मंदिर जगभग 500 साल पुराना है। जिस प्रकार गोविंद नए शहर के कुलदेवता हैं उसी प्रकार बालाजी भी प्राचीन काल से इस क्षेत्र के कुल देवता रहे हैं। गलतापीठ ट्रस्ट के अधीन इस मंदिर का रखरखाव और सेवापूजा सुदर्शनाचार्य 25 वर्षों से कर रहे हैं। प्राचीन समय में इन पहाडियों के आसपास बसे कई गांव और परगनों के लोगों से मंदिर का खास जुड़ाव था। यहां मनौतियां मांगी जाती रही हैं। उनके पूर्ण होने पर जागरण, अनुष्ठान, रामायण पाठ और धार्मिक कार्यक्रम भी होते रहे हैं। बालाजी की यह मूर्ति स्वयं प्रकट है और इसे जलती ज्योत का मंदिर भी कहा जाता है। वर्षभर यहां उत्सवों का माहौल रहता है। कुछ उत्सवों में तो जयपुर और आसपास से श्रद्धालु उमड़ ही पड़ते हैं। खास तौर से लक्खी पौषबड़ा के अवसर पर। हिन्दू माह पौष में भगवान को नमकीन व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और गर्मागर्म बड़े तले जाते हैं। यही प्रसाद भक्तों में बांटा जाता है। लगभग 50 वर्षों से यहां लक्खी पौषबड़ा का आयोजन किया जा रहा है। लक्खी से तात्पर्य ऐसा उत्सव जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। पौषबड़ा के अवसर पर मंदिर में सांगानेर, नायला, चांदपोल और आसपास के कई गांवों से पदयात्राएं यहां आती हैं। हनुमानजी के भजन होते हैं और श्रद्धालु पौष प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसी तरह अन्नकूट, शरदपूर्णिमा, रूपचतुर्दशी, हनुमान जयंती और फागोत्सव भी यहां धूम-धाम से मनाए जाते हैं। गलता तीर्थ में डुबकी लगाने के लिए इस रास्ते से आने वाले श्रद्धालु यहां माथा जरूर टेक कर जाते हैं।

ऐसी महिमा है बालाजी की। पास में एक गांव है जामडोली। मंदिर की सीमा से सटकर। कभी कभी यह मंदिर जामडोली के बालाजी के नाम से भी पुकारा जाता है।

मनोरम स्थल। बरामदे से होकर छत पहुंचे तो चारों ओर अरावली की हरी भरी पहाडि़यों ने ठण्डी हवा के साथ स्वागत किया। शांति और सुकून के मोती यहां श्रद्धा के धागे में पिरोए हुए से लगते हैं। सीढियों से उतरते हुए बार बार नजर इन खूबसूरत बराबदों, शिवालय के अदभुद स्तंभों, जगमोहन के नयनाभिराम चित्रों पर ठहर ठहर जाती है।

भ्रमण करने के लिए यह शांत घाटी और हनुमान मंदिर उपयुक्त स्थान है।

आशीष मिश्रा
09928651043
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