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लोक संगीत एवं नृत्य

लोक संगीत एवं नृत्य

मनुष्य स्वभाव से ही संगीत प्रेमी होता है। यही कारण है कि संगीत चाहे किसी भी प्रदेश अथवा समुदाय का हो सबके मन को आकर्षित करता है। लगभग सभी प्रदेशों का अपना-अपना लोक संगीत होता है। इसमें वहाँ की परम्पराएँ, रीति-रिवाज, विभिन्न संस्कार, आध्यात्कि विश्वास, सामाजिक उत्सव आदि का समावेश होता है। हमारे राजस्थान का लोक संगीत राजस्थान के जन-जीवन का प्रमुख अंग है। यह शास्त्रीय संगीत के नियमों के बंधन से परे है। हमारे कुछ प्रमुख लोकगीतों का वर्णन इस प्रकार है।
पणिहारी – यह पनघट से जुड़े लोक गीतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसमें पतिव्रत धर्म पर अटल पणिहारिन व पथिक के संवाद को गीत रूप में गाया जाता है। जैसे – कुण रे खुदाया कुआँ, बावड़ी ए पणिहारी जी रे लो।

मिरगा नैणी जी रे लो,

कुणरे बंधाया भीम तलाव, वाला जी

गोरबंद – गोरबंद ऊँट के गले का एक आभूषण होता है। इस गीत से ऊँट के ाृंगार का वर्णन मिलता है। जैसे –

लड़ली लूमा झूमा ए, म्हारो गोरबंध नखरालो,

आली जा म्हारो गोरबंध नखरालो।

ओलदूं – ओलदूं का मतलब किसी स्नेहीजन को याद करने से है। यह विरहिणी स्त्रियों द्वारा पति की याद में गाया जाता है।

‘ओ जी ओ गोरी रा लसकरिया ओल्यूंडी लगा थे

कोठै चाल्याजी ठोला …………………………….

हिचकी भी इसी प्रकार का लोकगीत है।
मोरियो – मोर के लिए गाया जाने वाले गीत को मोरिया गीत कहते है। यह प्रमुख लोकगीत है।
मोरियों आछौ बोल्यौ रे ठलती रात मां,

म्हारे हिवडै में त्हैगी रे कटार मोरियां ………।

आछौ बौल्यौ रे ढलती रात मां ………।

वर्षा ऋतु के गीत – वर्षा ऋतु से संबंधित गीत वर्षा ‘ऋतु गीत’ कहलाते है।  वर्षा ऋतु में बहुत से सुन्दर गीत गाये जाते है। इस गीत में वर्षा ऋतु को सुरंगी ऋतु की उपमा दी गई है।

‘ओ कुण बीजै बाजरौ ए बादली

ओ कुण बीजै मोठ, मेवा, मिसरी,

सुरंग ऋतु आई म्हारा देस में,

भली रे ऋतु आई म्हारा देस में।

विनायक – विनायक (गणेश) मांगलिक कार्यो के देवता है। अत: मांगलिक कार्य एवं विवाह के अवसर पर सर्वप्रथम विनायक जी का गीत गाया जाता है। गीत इस प्रकार से है –

‘चालो ओ, विनायक आपां जोसीड़ा रेचालां,

आछा-आछा लगन लिखावां ओ गजानन

ओ म्हारा बिड़द विनायक

बना-बनी – हमारी संस्कृति के अनुसार जिस युवक व युवती की शादी होने वाली होती है, उस युवक को बना तथा युवती को बनी कहा जाता है। विवाह के अवसर बना-बनी बनकर जो गीत गाये जाते है। ‘बना-बनी’ कहलाते है। बना-बनी के गीत प्रकार से है।

बनो तो म्हारै रामचन्द्र अवतार,

बनी तो म्हारी सीता जानकी….।

इस गीत का अर्थ भी इस प्रकार से है कि परिवार वाले ‘बना’ बने अपने लड़के की विशेषता बता रहे है कि हमारा बना तो श्री रामचन्द्र का अवतार जैसा है और बनी के परिवार वाले अपनी बेटी की प्रशंसा में उत्तर देते हुए कहते है कि अगर आपका बना रामचन्द्र अवतार है, तो हमारी बनी अर्थात् पुत्री जानकी सीता है।
लोकभजन – हमारी संस्कृति ने देवी-देवताओं का विशिष्ट स्थान है। किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए लोकभजनों द्वारा इष्ट को प्रसन्न किया जाता है। कुछ लोकभजन इस प्रकार से है –
‘बाजे छै नौबत बाजा, म्हारा डिग्गीपुरी का राजा

‘म्ह हेलो देती आई म्हारी माय, सोना रा झांझर बाजणा’

खम्मा खम्मा खम्मा रे कंवर अजमाल जी रा ………..

लोकनृत्य – लोकगीतों के साथ किए जाने वाले नृत्य लोकनृत्य कहलाते है। प्रमुख लोकनृत्य भवई, घूमर, गीदड़, तेराताली कालबेलिया, अग्निनृत्य, चरी आदि है। ये नृत्य विभिन्न अवसरों पर देखे जा सकते है।
लोक संगीत एवं नाट्य
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